Saturday, October 16, 2010

जल गया रावण

पण्डित था वो, ज्ञानी था बस थोड़ा अभिमानी था
नाथ त्रिलोकी के चरणों में, दश शीश का दानी था
कर के घमंड ज्ञान पर अपने, वो बन गया रावण
सीता की शीतलता में देखो, जल गया रावण ।।
ऋषि-मुनियों को प्रताड़ित करने का शोक बेमानी था
प्रभु सत्ता से टक्कर ली वो कितना अज्ञानी था
समझ ना पाया खेल प्रभु का वो अत्याचारी रावण
सीता की शीतलता में देखो जल गया रावण ।।
जगत जननी मां सीता का उसने किया हरण था
देने अंजाम दुष्कृत्य को साधु वेष किया वरण था
दश मस्तक थे पर अपना अंत समझ ना पाया रावण
सीता की शीतलता में देखों जल गया रावण ।।
छीन लेगा सब कुछ उसका, जिसने उसे दिया था
प्रभु ने दी है ताकत ये कैसे भूल गया था
इतने जप तप से पायी सत्ता के मद में डूब गया रावण
सीता की शीतलता में देखो जल गया रावण ।।

Tuesday, August 31, 2010

जाने किधर

लो लम्हा-लम्हा करता
देखो वक्त गुजर गया,
कोई मिलकर वहीं रहा
कोई जाने किधर गया ।
सबने अपनी राह पकड़ली
वो प्यारा दोस्त बिछड़ गया,
हाथ पकड़ कर साथ रहे हैं
अब वक्त हाथ से फिसल गया ।
पूरा होते ही देखो पड़ाव
कारवाँ वहाँ से गुजर गया,
कुछ के लिए चली हैं राहें
कुछ के लिए वक्त ठहर गया ।
वादा था साथ चलेंगे हम
वो वादा जाने किधर गया,
भौतिक सुख की अभिलाषा में
साथी जाने किधर गया ।

Monday, August 30, 2010

अब तो चले आओ

भीगा भीगा सा मौसम है
रेशमी बारिश में वक्त है ठहरा,
तेरी यादों के घने कोहरे ने
मेरी साँसो पर लगा दिया है पहरा ।
पूरा शहर भीगा है अबके
घर मेरा क्यों छूट गया है,
इक पागल दीवाना बादल
किसी बात पर शायद रूठ गया है ।
तू आयेगा शायद अब
घर आँगन मेरा महक रहा है,
प्यार तेरा सीने में मेरे
ज्वालामुखी बन दहक रहा है ।
बावरा मन मयूर मेरा होले से
कानों में कुछ बोल गया है,
जिस्म की बात कहूँ क्या तुझसे
अब तो मन भी मेरा डोल गया है ।
रिश्ते नाते सब भूल चूका हूँ
तेरे प्यार का घाव है गहरा,
अब तो चले आओ दिलबर
सिर पर मेरे ना सज जाये सेहरा ।

Sunday, August 1, 2010

तेरा साथ

बहुत पहले जब मैं तन्हा था उदास था
घुप्प अंधेरों का जीवन में मेरे वास था
सूझता नहीं था कुछ घेरे हुए मुझे अवसाद था
गायब था नूर मेरा आँखों में सैलाब था
बोझ लगती थी जिंदगी राहों पर बिछा कांटों का जाल था
मर चुके थे सपने मेरे ना अपने पर विश्वास था
जब मिले तुम तो लगा खुदा को मेरे दुखों का एहसास था
पाकर साथ तेरा मैने अब छू लिया आकाश है
चीरकर अंधेरों को तूने जीवन में किया उजास है
अपने पर से भी ज्यादा मुझे तुंम पर अब विश्वास है
दोस्त तुमसा ना कोई मेरा ना कोई खास है
डर नहीं है मुझे दुनिया का अब तू जो मेरे पास है
बदला है जीवन मेरा खुशियां लेने लगी विस्तार हैं
आज मैं जो कुछ भी हूं ये तेरी दोस्ती का उपहार है।

Thursday, July 29, 2010

जिंदगी

एक सूखे पत्ते सी जिंदगी
हवा के थपेड़ों से इधर उधर होती
चली जा रही है किस राह
रुकती भागती जागती सोती
कभी हवा कुछ नरम
कभी लुएं गरम
बेपरवाह, झुलसती जिंदगी
एक सूखे पत्ते सी जिंदगी।
जाना कहां है खबर नहीं
जो राह है, वो उसकी डगर नहीं
साथी छूटे, अपने रुठे
रिश्ते तोड़ती, सब पीछे छोड़ती जिंदगी
एक सूखे पत्ते सी जिंदगी।
दुनिया की गर्मी से कुम्हलाती
अपनों की नफरत से मुरझाती
नए रिश्ते बनाती,चली जाती जिंदगी
तूफानों से घबराती
हर मोड़ पे रूक जाती
फिर नए जोश से उठ जाती जिंदगी
एक सूखे पत्ती सी जिंदगी।

आ देख ज़रा...

लो देखो आज सावन की
फिर से झड़ी लगी है
आँखें आज मेरी
न जाने क्यूं बहने लगी हैं।
तू पास था मेरे तो
झीलें बहा करती थी
पर अब तो इनमें
खामोशी बसा करती है
पलकों पर जो आते थे मोती
पगली दुनिया अब उनको
आँसू कहा करती है।
ना जाने कितने दिन तक
रिमझिम-रिमझिम बरसेंगी
आ देख ज़रा हालत इनकी
पिर जीवन भर तू तरसेगी
मेरे गालों पर निशां बाकी हैं
मेरी तन्हा रातों के
तू देख ज़रा आकर
अब भी गंगा-जमुना बहती है
तू चला गया है दूर कहीं
छोड़ के दुनिया मेरी
इन सागर जैसी आँखों में
आज भी सूरत बसी है तेरी।

एहसास...

वक्त की किताब के जब पन्ने पलटता हूं
तो हमेशा पाता हूं कि
तुम मुस्कुराती इठलाती
बलखाती, शरमाती हुई
मेरे पास आती हो।
धीरे से अपने कोमल हाथों से
गुलाब सी पंखुड़ियों वाले
अपने गुलाबी अधरों से
मेरे श्रवण पटल पर
अपनी संदली सी आवाज बिखेर जाती हो।
छेड़ देती हो एक तान
जो मेरे तन-मन को
पुलकित कर जाती है।
स्पर्श के उस एहसास को
मैं महसूस करता हूं
अपने रोम-रोम में
चारों तरफ छा जाता है
तेरे वजूद़ का कोहरा।
क्या आईना क्या दीवार
क्या धरती क्या आकाश
कुछ नज़र नहीं आता
बस पास रहता है तेरा एहसास
तू पूछती है कैसे हो
तब मैं इतना ही कह पाता हूं
सिर्फ तेरी यादें ही हैं
जो जिंदा होने का एहसास देती हैं।।

पतझड़ के बाद...

उसने कहा था एक बार
पतझड़ के बाद जब
लौटेगा फिर से बसन्त
कोपलें फूटेंगी वृक्षों पर
चारो तरफ होगी हरियाली
भीनी-भीनी खुशबू
महकाएगी तन-मन को
तब तुम महसूस करोगे
कितना जरूरी है पतझड़।।
चिड़िया मोर सब नाचेंगे
उजड़े बाग सँवर जाएंगे
गैंदा, गुलाब, जूही और चमेली
मिलकर खुशियां बांटेंगे
खिला-खिला होगा हर चेहरा
गमों के निशां मिट जाएंगे
जो दूर गए थे पंछी
अपने घर को वापस आएंगे
घर वापस आने के सुख में
तुम महसूस करोगे
कितना जरूरी है पतझड़।।
दु:ख तो आना-जाना है
फिर मन उदास क्यूं है तेरा
हर घनी काली रात का
अंत करने आता रोज सवेरा
हताश ना हो निराश ना हो
उम्मीदों के दीप जलाए जा
इतनी आसानी से मिल जाए सब
तो क्या जीवन का मोल रहा
दु:ख घटेंगे दर्द मिटेंगे
फिर लौट आएगा सुख
तब तुम महसूस करोगे
कितना जरूरी है पतझड़।।

Sunday, July 25, 2010

मेरी माँ

उसे देवी कहूँ या दुआ कहूँ
समझ नहीं आता क्या कहूँ
फिर भी बिना कहे कैसे रहूँ।
सपनों में भी रखती है जो मेरा ध्यान
सदा अटकती है मुझमे जिसकी जान
इक पल को भी जिसे नहीं आता अभिमान
छोड़ के आँचल उसका कैसे रहूँ
समझ नहीं आता क्या कहूँ
फिर भी बिना कहे कैसे रहूँ ।
पग - पग पर जो फूल बिछाती
सर शैय्या पर वो सो जाती
मुझे खिलाकर खुद भूखी रह जाती
मेरा सर आँचल मे रख सहलाती
इस उम्र में भी मुझ बिन ना रह पाती
बिन उसके मैं कैसे रहूँ
समझ नहीं आता क्या कहूँ
फिर भी बिन कहे कैसे रहूँ ।
मेरे लिए सबसे लड़कर आती
मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे जाती
हो ना जाए मुझे कुछ, सोचकर घबराती
एक बार रूठूँ तो सौ बार मनाती
ऐसी माँ को शब्दों मे कैसे कहूँ
समझ नहीं आता कैसे कहूँ
फिर भी बिना कहे कैसे रहूँ।

पिता

एक शख्स है ऐसा
जिसका साया भी
मुझे हिम्मत देता है
ऊर्जा देता है कुछ करने की
ललक पैदा करता है
आगे बढ़ते रहने की
हर हाल में जो चाहता है
मैं आगे बढ़ता रहूँ
अपने सब सुखों को त्याग
सींचता है मेरा जीवन
कितना स्नेह है उसको
मुझसे कहता नहीं कभी
देख कर मेरे दुख
विचलित होता है जो
मेरे पिता हैं वो[1]
बचपन से जवानी तक
जिसने मुझे तराशा है
मेरे कन्धों पर रख हाथ उसने
हर छोटी बात सिखाई है
छोटे से छोटे रिश्ते की
अहमियत बताकर उसने
जीने की कला सिखाई है
देखो,अगर निभा ना सको तो
रिश्ता कोई बनाना नहीं
हर छोटी बात पर तुम
अपने आँसू बहाना नहीं
छोटी-छोटी खुशियाँ
समेट कर मेरे लिए
अपने हाथों मे लाता है जो
कोई और नहीं मेरे पिता हैं वो।

बारिश

अमृत की बून्दे बरसी हैं
बनकर अंबर का प्यार धरा पर
जैसे पागल प्रेमी ने
जड़ दिये हों चुंबन प्रियतमा पर [1]
अब निखरेगा यौवन धरा का
श्रृंगार करेगी धरती पेड़ों से
फूलों की डाली गूंथेंगी गजरा
गलहार बनेंगे बेल लताओं से [2]
सौंधी–सौंधी खुशबू मिट्टी की
महकाएगी धरती का तन मन
अंबर धरा की स्नेह लीला की
गवाही बनेंगे वन उपवन [3]
कोयल की कूहू कूहू में
धरती का प्यार बरसता है
सुनने को प्यार भरी ये बोली
अंबर कितने मास तरसता है [4]
छम छम करती बूँदें भी
प्यार का राग सुनाती हैं
पाकर अंबर का प्यार धरा
धन्य धन्य हो जाती है [5]
मीलों दूर खड़े दो प्रेमी
देख-देख मुस्काते हैं
मिलने को गले इक दूजे को देखो
अपनी बाहें फैलाते हैं[6]
शाखायें बन बाहें धरती की
अंबर की और चली जाती
बारिश की छोटी–छोटी बूँदें
अंबर की बाहें बन जाती [7]
हवा गा रही गीत सुहाने
बनकर मतवाला जोगी
अंबर-धरा के मिलन की परिणिति
अगणित लोगों के दुख हर लेगी [8]