Thursday, July 29, 2010

जिंदगी

एक सूखे पत्ते सी जिंदगी
हवा के थपेड़ों से इधर उधर होती
चली जा रही है किस राह
रुकती भागती जागती सोती
कभी हवा कुछ नरम
कभी लुएं गरम
बेपरवाह, झुलसती जिंदगी
एक सूखे पत्ते सी जिंदगी।
जाना कहां है खबर नहीं
जो राह है, वो उसकी डगर नहीं
साथी छूटे, अपने रुठे
रिश्ते तोड़ती, सब पीछे छोड़ती जिंदगी
एक सूखे पत्ते सी जिंदगी।
दुनिया की गर्मी से कुम्हलाती
अपनों की नफरत से मुरझाती
नए रिश्ते बनाती,चली जाती जिंदगी
तूफानों से घबराती
हर मोड़ पे रूक जाती
फिर नए जोश से उठ जाती जिंदगी
एक सूखे पत्ती सी जिंदगी।

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