एक सूखे पत्ते सी जिंदगी
हवा के थपेड़ों से इधर उधर होती
चली जा रही है किस राह
रुकती भागती जागती सोती
कभी हवा कुछ नरम
कभी लुएं गरम
बेपरवाह, झुलसती जिंदगी
एक सूखे पत्ते सी जिंदगी।
जाना कहां है खबर नहीं
जो राह है, वो उसकी डगर नहीं
साथी छूटे, अपने रुठे
रिश्ते तोड़ती, सब पीछे छोड़ती जिंदगी
एक सूखे पत्ते सी जिंदगी।
दुनिया की गर्मी से कुम्हलाती
अपनों की नफरत से मुरझाती
नए रिश्ते बनाती,चली जाती जिंदगी
तूफानों से घबराती
हर मोड़ पे रूक जाती
फिर नए जोश से उठ जाती जिंदगी
एक सूखे पत्ती सी जिंदगी।
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