उसे देवी कहूँ या दुआ कहूँ
समझ नहीं आता क्या कहूँ
फिर भी बिना कहे कैसे रहूँ।
सपनों में भी रखती है जो मेरा ध्यान
सदा अटकती है मुझमे जिसकी जान
इक पल को भी जिसे नहीं आता अभिमान
छोड़ के आँचल उसका कैसे रहूँ
समझ नहीं आता क्या कहूँ
फिर भी बिना कहे कैसे रहूँ ।
पग - पग पर जो फूल बिछाती
सर शैय्या पर वो सो जाती
मुझे खिलाकर खुद भूखी रह जाती
मेरा सर आँचल मे रख सहलाती
इस उम्र में भी मुझ बिन ना रह पाती
बिन उसके मैं कैसे रहूँ
समझ नहीं आता क्या कहूँ
फिर भी बिन कहे कैसे रहूँ ।
मेरे लिए सबसे लड़कर आती
मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे जाती
हो ना जाए मुझे कुछ, सोचकर घबराती
एक बार रूठूँ तो सौ बार मनाती
ऐसी माँ को शब्दों मे कैसे कहूँ
समझ नहीं आता कैसे कहूँ
फिर भी बिना कहे कैसे रहूँ।
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