बहुत पहले जब मैं तन्हा था उदास था
घुप्प अंधेरों का जीवन में मेरे वास था
सूझता नहीं था कुछ घेरे हुए मुझे अवसाद था
गायब था नूर मेरा आँखों में सैलाब था
बोझ लगती थी जिंदगी राहों पर बिछा कांटों का जाल था
मर चुके थे सपने मेरे ना अपने पर विश्वास था
जब मिले तुम तो लगा खुदा को मेरे दुखों का एहसास था
पाकर साथ तेरा मैने अब छू लिया आकाश है
चीरकर अंधेरों को तूने जीवन में किया उजास है
अपने पर से भी ज्यादा मुझे तुंम पर अब विश्वास है
दोस्त तुमसा ना कोई मेरा ना कोई खास है
डर नहीं है मुझे दुनिया का अब तू जो मेरे पास है
बदला है जीवन मेरा खुशियां लेने लगी विस्तार हैं
आज मैं जो कुछ भी हूं ये तेरी दोस्ती का उपहार है।
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