Thursday, July 29, 2010

एहसास...

वक्त की किताब के जब पन्ने पलटता हूं
तो हमेशा पाता हूं कि
तुम मुस्कुराती इठलाती
बलखाती, शरमाती हुई
मेरे पास आती हो।
धीरे से अपने कोमल हाथों से
गुलाब सी पंखुड़ियों वाले
अपने गुलाबी अधरों से
मेरे श्रवण पटल पर
अपनी संदली सी आवाज बिखेर जाती हो।
छेड़ देती हो एक तान
जो मेरे तन-मन को
पुलकित कर जाती है।
स्पर्श के उस एहसास को
मैं महसूस करता हूं
अपने रोम-रोम में
चारों तरफ छा जाता है
तेरे वजूद़ का कोहरा।
क्या आईना क्या दीवार
क्या धरती क्या आकाश
कुछ नज़र नहीं आता
बस पास रहता है तेरा एहसास
तू पूछती है कैसे हो
तब मैं इतना ही कह पाता हूं
सिर्फ तेरी यादें ही हैं
जो जिंदा होने का एहसास देती हैं।।

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