Friday, July 22, 2016

तजुर्बा बहुत बड़ी चीज है जो बाजार मे नहीं मिलता है, ये तो वक्त के साथ - साथ अपने आप इंसान सीख जाता है ।कुछ लोग होते हैं जो दूसरों की गलतियों से सीख जाते हैं और कुछ स्वयं गलती करके भी नहीं सीख पाते । जो इंसान स्वयं की गलती से भी सीखने की काबिलियत नही रखता उसे समय के साथ लुप्त होना पड़ता है।
आज देश मे वामपंथ जो आखिरी सांसे गिन रहा है उसके लिए वामपंथियो की नही सीखने की काबिलियत ही जिम्मेदार है ।
खैर यहां बात वामपंथियों की नहीं , विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने का दम भरने वाली भाजपा की हो रही है ।
भाजपा नेतृत्व मे जो लोग हैं उनका राजनीतिक अनुभव बहुत ही कमजोर है ।
वहीं काँग्रेस पार्टी के जो लीडर हैं उनमें वो सारे गुण मौजूद हैं जो एक कुशल राजनितिग्य मे होने चाहिए । किस मुद्दे को कहां और कब उठाना है यह काँग्रेस अच्छी तरह जानती है । इस बात मे कोई दो राय नही है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का गौरव और अनुभव उसके पास है ।
७० साल देश की एवं विभिन्न राज्यों की सरकार चलाने का तजुर्बा काँग्रेस के पास है ।भाजपा शासित राज्यों मे कभी आरक्षण का मुद्दा, कभी हिन्दू - मुस्लिम दंगे और कभी दलितों पर अत्याचार आदि तुरंत मुद्दे बना लिये जाते हैं और पूरे देश में इनकी प्रतिक्रिया तुरंत होती है ।
क्या ये सब घटनाएं भाजपा शासन मे ही होती हैं ? नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है । काँग्रेस शासित राज्यों मे भी ऐसी घटनांए बहुतायत से होती हैं लेकिन उसके नेतृत्व को ये तजुर्बा है कि इन मुद्दों से पार कैसे पाया जाता है ।
काँग्रेस ये अच्छी तरह जानती है कि राजनीति समस्याओं को खत्म करने मे नहीं बल्कि उन्हे व्यवस्थित करने मे है ।
अगर ऐसा नहीं होता तो आखिर क्यों लगभग सभी राज्यों मे भाजपा सरकार आते ही ये मुद्दे विकराल रूप ले लेते हैं ।
हम अगर दिमाग पर जोर डालें तो पाएंगे कि काँग्रेस का जब शासन होता है तो राज्य मे एकदम शांति होती है और भाजपा सरकार आते ही ऐसा क्या हो जाता है कि कभी किसान आंदोलन करते हैं, कभी विभिन्न जातियों में आरक्षण कि आग लग जाती है, कभी डॉक्टर हड़ताल पर चले जाते हैं, कभी महंगाई मरोड़े मारने लगती है ।
ये सब मुद्दे तभी उठते हैं जब नेतृत्व अकुशल हो बेतजुर्बेकार हो ।
भाजपा नेतृत्व को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि अभी राजनीति मे वो काँग्रेस के मुकाबले अपरिपक्व है ।
हाल ही की घटना है, उत्तराखण्ड और अरूणाचल का मुद्दा काँग्रेस का आंतरिक मुद्दा था और बदनाम हो गई भाजपा । इसी जगह अगर भाजपा मे विरोध हुआ होता तो यकीन मानिये भाजपा को दोनो जगह सत्ता से हाथ धौना पड़ता । मजबूरी मे भाजपा के पास एक ही जवाब होता कि "हम सत्ता के लिए गलत लोगों से समझौता नहीं करते " ।
और हां, क्या ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी पार्टी के नेता ने पहली बार अपशब्द इस्तेमाल किये हों, कितनों का इस्तीफा लिया गया ।खुद लालू प्रसाद ये कह कर साफ बच निकले कि मेरे मुंह मे शैतान घुस गया था, दिग्विजय सिंह जब तब तुच्छ भाषा का इस्तेमाल करते रहते हैं, उनका क्या बिगड़ गया ।अपनी अनुभव हीनता के कारण भाजपा वाले इनको मुद्दा नही बना पाते । नये प्रकरण में अंतर सिर्फ इतना है कि इस बार वक्ता भाजपा से है और जाहिर है कि भाजपा को ये सब मैनेज करना नहीं आता । क्यों भाजपा शासित राज्यों के मुद्दे साम्प्रदायिक और जातिवादी बनाकर पेश कर दिये जाते हैं?
गुजरात में हाल ही मे घटित प्रकरण सवर्ण लोगों का दलितों पर अत्याचार बनाकर जनता के सामने परोस दिया गया जबकि खबरों के मुताबिक उसमे मुस्लिम युवक भी शामिल था ।
आखिर भाजपा नेतृत्व इन सब बातोंसे कब कोई सीख लेगा ?
मुद्दे गौण करना और उनका लाभ उठाना काँग्रेस वालों से सीखना चाहिए । भाजपा नेतृत्व स्वयं की गलतियों से नहीं सीख रहा और दूसरी तरफ आ आ पा दूसरों की गलतियों से सीख कर देश की राजनीति में पैठ बढा रही है । हालांकि आ आ पा में कांग्रेस के ही असंतुष्ट लोग हैं ।
मीडिया से लेकर हर पार्टी भाजपा के पीछे पड़े हैं लेकिन ये गुण सीखने तो पड़ेंगे जितना जल्दी हो उतना अच्छा ।
वो कहते हैं ना "...........इक आग का दरिया है और डूब के जाना है " ।

Sunday, July 17, 2016

युवा एवं उत्साही पत्रकारों द्वारा निकाला गया समाचार पत्र मीडिया स्केन पढा जिसे भाई आशीष कुमार अंशु ने उपलब्ध करवाया ।
दशकों से की जा रही गलत एवं एकतरफा रिपोर्टिंग पर केन्द्रित यह अंक पढकर ज्ञात हुआ कि समाज में जो वास्तव मे घटित हो रहा है वह तो समाज के सामने आ ही नही रहा मतलब अब खबरें भी मुखोटा पहन ने लगी हैं। इस तरह की एक तरफा पत्रकारिता समाज को बांटने का ही काम कर रही है जो कि तथाकथित पत्रकार का उद्देश्य भी रहता है क्योंकि वो किसी और के हाथों की कठपुतली होता है ।
सूचना क्रांति के इस युग मे भी समाज के सामने सच्ची खबरें नही आ रही यह सूचना संसाधनो का दुरूपयोग ही कहलायेगा ।
लोग स्वार्थवश इस प्रकार की रिपोर्टिंग कर रहे हैं कि बेगुनाह होते हुए भी लोगों को शारीरिक, मानसिक प्रताड़नांए भुगतनी पड़ रही हैं उदाहरण के तौर पर गुजरात दंगो के समय फोटो पत्रकार की प्रसिद्धि पाने की लालसा के कारण एक सीधे साधे इंसान का जीवन ही बरबाद कर दिया ।
पत्रकारों का एक विशेष तबका ( जो कि वास्तव में पत्रकार कहलाने योग्य नहीं है ) खबरों का इस तरह से पोस्टमार्टम करता है कि खबर की तासीर ही बदल जाती है । और फिर शुरू होता है खबरें घुमाने का खेल क्योंकि ढोंगी पत्रकार यह अच्छी तरह समझते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक परिस्थितियां एेसी हैं कि उनके द्वारा बनाई गई झूठी खबर की सच्चाई सूदूर इलाकों मे पंहुचते - पंहुचते इतना वक्त ले लेगी कि तब तक उस खबर मे निहित स्वार्थ पूर्ण हो चुका होगा । मीडिया स्केन मे आदिवासी इलाकों का सच जानने के बाद बस यही एक दुअा है ईश्वर से कि आप सभी पत्रकारों का हौसला बनाए रखे ताकि समाज के हर तबके तक समाज मे फैलाई जा रही इस वैमनस्यता की सच्चाई पंहुच सके ।
समाज के लोगों से भी यही अपेक्षा की जाती है कि सच्चाई के साथ खड़े हों और पत्रकारिता को धर्म की तरह मानने वाले लोगों का पूर्ण सहयोग करें ।
साथ ही साथ यह कामना भी कि जो ढोंगी पत्रकार समाज मे वैमनस्यता फैलाकर अपनी तिजोरी भर रहे हैं तथा राजनैतिक आकाओं के मंसूबे पूर्ण कर रहे हैं उनका प्रतिकार करें तथा अपने आस पास के परिवेश से बहिष्कृत करें एवं उनके लिखे हुए पर आंख बंद कर विश्वास ना करें, जिससे किसी बेगुनाह को शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना ना झेलनी पड़े ।
लगे हाथ ही एक बात और जिस प्रकार अपने फायदे के लिए खबरें दबा दी जाती हैं उस से एक ना एक दिन सामाजिक सोहार्द्र बिगड़ कर ही रहता है।
मीडिया स्केन के द्वारा ही यह जानकारी मिली कि मिजोरम के अल्प संख्यक चकमा बौद्धों पर हो रहे अत्याचार की खबरें बाहर समाज तक आ ही नहीं रही हैं क्योंकि राष्ट्रीय मीडिया इस पर चुप्पी साधे बैठा है यह बौद्ध समाज पर हो रहे अत्याचारों मे शामिल होने जैसा ही अपराध है ।
आखिर खबरें दबाकर मीडिया किसका भला कर रहा है यह बात जानने योग्य है ।
अल्प संख्यकों एवं दलितो के उत्थान का दम भरने वाले सामाजिक संगठन एवं राजनीतिक दलों की चुप्पी को स्वार्थपरता ही कहा जाएगा ।
यह चुप्पी इन संगठनो एवं राजनीतिक दलों के गठबंधन को जल्द ही भारी पड़ने वाली है क्येकि देखने मे यह आ रहा है कि कुछ युवा पत्रकार इन सबके दुष्कृत्यों को उजागर करने के लिए कमर कस चुके हैं ।
उम्मीद है मीडिया स्केन की निस्वार्थ एवं नैतिक पत्रकारिता की मुहिम जल्द ही पत्रकारिता के क्षेत्र मे बडे़ बदलाव की साक्षी बनेगी और यह स्वाभाविक है कि समाज भी इस से लाभान्वित होगा ।

Saturday, July 16, 2016

मोदीमय भारत

#मोदीमय भारत -
साल २०१४ के आम चुनाव से काफी पहले ही नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना तय हो चुका था ।
चारों तरफ एक ही चर्चा थी कि "अबकी बार मोदी सरकार" ।
प्रचार भी बहुत जबरदस्त हुआ था । जिधर देखो उधर ही "मोदीफाइड इंडिया", "मोदीमय भारत", "हर-हर मोदी घर-घर मोदी" के नारे सुनाई दे रहे थे । आम चुनाव के नतीजो ने इन सब नारों को जाया नहीं होने दिया । सभी लोग प्रधानमंत्री मोदी की जीत और इन सब नारों मे अपने-अपने हिसाब से सामंजस्य बिठा रहे थे कि चुनावी विजय के साथ ही इंडिया मोदीफाइड और भारत  मोदीमय  हो चुका है । घर- घर मे मोदी आ चुका है ।
किन्तु विरोधियों का कहना था कि अगर ऐसा होता तो शत - प्रतिशत वोट मोदी को ही मिलने चाहिए थे । इन्ही सब बातों को प्रधानमंत्री ने धता बताते हुए कई कदम अागे बढकर सभी चुनावी नारों को सार्थक किया है । आज जब नजर उठा कर देखते हैं तो पूरा भारत मोदीमय नजर आता है । प्रधानमंत्री के चाहने वाले आज भी बढ ही रहे हैं । प्रशंसक आज भी उनकी कार्यशैली की तारीफ कर रहे हैं । चाहने वालों की नजरों मे आज भी अपने नेता की चमक बरकरार है जबकि किसी की भी चमक फीकी करने के लिए दो साल काफी होते हैं । उसी प्रकार हर विरोधी पार्टी के नेताओं की जुबान पर भी सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी का ही नाम है ।
जिस प्रकार एक अनन्य भक्त प्रातःकाल उठने से लेकर रात्री मे सोने से पहले तक दिनभर ( कई बार तो रातों को नींद से उठकर भी ) केवल भगवान का ही नाम जपता है उसी प्रकार मोदी विरोधी भी प्रधानमंत्री मोदी की ही निंदा करते हैं । सोशल मीडिया पूरे दिन भर प्रधानमंत्री मोदी विरोधी लेखों से अटा रहता है । सभी विरोधी आपसी वैमनस्य भुलाकर मोदी विरोध मे एकजुट हो गयें है ।
कांग्रेस, वामपंथी, लालू, नितीश, मायावती, ममता आदि सभी केवल और केवल प्रधानमंत्री को ही निशाना बनाये हुए हैं । किसी भी राज्य मे कोई भी दुर्घटना हो ( फिर चाहे वो राज्य मुलायम, लालू, नितीश, ममता, केजरी शासित ही क्यो ना हो ) विरोधियों की नजर मे सबका जिम्मेदार प्रधानमंत्री ही होता है ।
प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री मोदी का सबसे ज्यादा ध्यान विकास पर रहा है और उससे भी ज्यादा ध्यान पूर्वी भारत तथा जम्मू-कश्मीर पर रहा है, इन सबका प्रमाण प्रधानमंत्री मोदी द्वारा की गई पूर्वी राज्यों और जम्मू-कश्मीर की अनेक यात्रांए हैं । अरूणाचल का राजनैतिक हादसा ( कांग्रेस के लिए ) इस बात का प्रमाण है कि पूर्वी भारत मे भी हर हर मोदी घर घर मोदी की शुरूवात हो चुकी है, इस पर मुहर असोम मे प्रधानमंत्री की पार्टी की पहली बार सरकार बनने के साथ ही लग चुकी है ।
जम्मू- कश्मीर मे भी मोदी की पार्टी के द्वारा समर्थित सरकार है ।
हाल ही मे कश्मीर मे हुए दंगे भी अलगाववादियों की मोदी विरोधी मानसिकता ही प्रतीत होती है । केवल दो साल मे ही प्रधानमंत्री मोदी ने जिस प्रकार से जम्मू-कश्मीर की यात्रांए की हैं उससे अलगाववादियों की चूलें हिलने लग गई हैं, उन्हे अपना वजूद खतरे मे पड़ता दिखाई देने लगा है । इसीलिए अलगाववादी कश्मीर के लोगों की गरीबी और वहां के युवाओं की बेरोजगारी का फायदा उठाकर उन्हे समाज और देश  विरोधी गतिविधियों में उलझाकर उन्हें आतंक की तरफ धकेल रहे हैं । इस समय अलगाववादियों का एक ही लक्ष्य है कि जैसे भी हो भारत की छवि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय मे खराब करके प्रधानमंत्री मोदी को बदनाम करना है ताकि उन्हे पाकिस्तान से पैसा मिलता रहे और भारत से लड़ाके,  मतलब वहां भी मोदी ही मोदी ।
मैं कह सकता हूं कि आज के वक्त -
" क्या प्रशंसक और क्या विरोधी, हर जगह मोदी ही मोदी"
आम चुनावों से पहले "हर-हर मोदी, घर-घर मोदी नारे" का बहुत विरोध हुआ था किन्तु जिस भी इंसान ने ये नारा बनाया था वो बहुत ही दूरदर्शी रहा होगा ।
jitendragautamjaipur.blogspot.com

Tuesday, July 12, 2016

आओ देश सजायें हम

आओ देश सजायें हम
मिट्टी के घरोंदे प्यार से सजायें हम
नफरतें बसी हैं दिलों मे जो
आओ मिलकर दूर भगायें हम
आओ देश सजायें हम ।
रोशनी मोहब्बत की चमकांए हम
उजियारे अपनेपन के फैलायें हम
दरो दीवार मे बस चुकी है जो
उस अंधी कटुता को मिटायें हम
आओ देश सजायें हम ।
मजहबी खेल बहुत खेल चुके हम
खून खराबे बहुत देख चुके हम
अपनों का अपनों से खूब लिया बदला
चलो अब देश के काम आयें हम
आओ देश सजायें हम ।
क्यों आतंकी के साथ हुए हम
स्वर्ग को नर्क बनाने पर क्यों तुले हम
जिन घरोंदो को ढहाया है आज
भूल गये उन्ही मे बहुत खेले हैं हम
आओ देश सजायें हम ।
देश बड़ा या बड़े हैं हम
क्यों देश का मान गिरा रहे हम
हासिल क्या करना है नही मालूम
क्या अपनी राह भटक गये हैं हम
आओ देश सजयें हम ।

Sunday, July 10, 2016

जल रहा है कश्मीर क्यों, क्या तुम्हे नही पता
फूंक डाले अपने ही घरोंदे, क्या तुम्हे नही पता
बीज बोया है जिसने भी आतंक का,
ऐसी बेकद्री की मौत मरेगा, क्या तुम्हे नहीं पता ।
देश भक्ति मांगता है देश, क्या तुम्हे नहीं पता
गद्दारी की सजा  मौत है, क्या तुम्हे नहीं पता
समझाते लाल को पहले अपने,
दोजख मे ही जायेगा, क्या तुम्हे नही पता ।

Saturday, February 25, 2012

ख़ुदा बचाए

मैंने दीप जलाया ही नहीं तो मैं बुझाऊँ क्या,
उसके बारे मे सोचा ही नहीं तो उसको बताऊँ क्या ।
प्यार, मोहब्बत और आशिक़ी सब ज़िंदादिली हैं
जब दिल ही जिंदा नहीं तो फिर किसी से लगाऊँ क्या ।1।
कहते-कहते थक जाता हूँ शब्दों की प्यास बुझाऊँ कैसे
मेरे अंदर वो रहती है ये उसको मैं बताऊँ कैसे ।
चीरकर सीना मेरा इक दर्द निकलता है बाहर
दुनिया से इस जख्म को अब छुपाऊँ कैसे ।2।
रोज मरहम लिए आते हैं बहुत से लोग मेरे अपने
रोज दिखा जाते हैं मुझे जिंदा रहने के सपने ।
अक्सर कह जाते हैं संभल कर रहना दुनिया में
बातों बातों में कैद किए जाते हैं मुझे घर में अपने ।3।
पत्थर सा हुआ जाता हूँ उसके ज़ख्म सह सहकर
आंखो के कोनो से वो बाहर आती है बह बहकर ।
मेरे दिल की आह से खुदा बचाए उसको
अब हर घड़ी यही दुआ करता हूँ रह रहकर ।4।

Thursday, February 3, 2011

गण-तंत्र

नमन करें गणतंत्र को हम, गण हैं जिसमें तंत्र नहीं ।
अपनी पीड़ा हरने का, इसमें कोई मंत्र नहीं ।।
अपने हक पर भी तुम, चुप रहना कुछ कहना नहीं ।
जो थोपे अपनी मरजी, क्या है असली गणतंत्र वही ।
गुलाम थे गुलाम हैं, यहां कोई भी स्वतंत्र नहीं ।
नमन करें गणतंत्र को हम, गण है जिसमें तंत्र नहीं ।।
जो ना पहले राज किया, तो तुम इसके हकदार नहीं ।
पुश्तैनी काम हमारा है, यह आम लोगों की सरकार नहीं ।
प्रजा गुलाम हमारी है, कुछ कहने-करने को स्वतंत्र नहीं ।
नमन करें गणतन्त्र को हम, गण हैं जिसमें तंत्र नहीं ।।
भेज बुलावा लोगों को, सड़कों पर लाते हैं वही ।
गोली दागी मानुष मारे, पत्थर बरसा दिए कहीं ।
तुच्छ मानसिकता वालों के, क्या अब भी हम परतंत्र नहीं ।
नमन करें गणतंत्र को हम, गण है जिसमें तंत्र नहीं ।।
धन जनता का लूट बने राजा, प्रजा का रक्षक कोई नहीं ।
कब तक लूट मचेगी ऐसे, प्रजा, प्रजा है दौलत का संयंत्र नहीं ।
बंधन काटे मुक्त करे, नजर न आता ऐसा मंत्र कहीं ।
नमन करें गणतंत्र को हम, गण हैं जिसमें तंत्र नहीं ।।
मौन खड़े हैं वजीर यहां, महारानी चलती चाल नहीं ।
गणतंत्र प्रजा का रक्षक है, राजाओं की ढाल नहीं ।
नींद खुले युवा राजकुमारों की, ढूंढों ऐसा यंत्र कहीं ।
नमन करें गणतंत्र को हम, गण है जिसमें तंत्र नहीं ।।