नमन करें गणतंत्र को हम, गण हैं जिसमें तंत्र नहीं ।
अपनी पीड़ा हरने का, इसमें कोई मंत्र नहीं ।।
अपने हक पर भी तुम, चुप रहना कुछ कहना नहीं ।
जो थोपे अपनी मरजी, क्या है असली गणतंत्र वही ।
गुलाम थे गुलाम हैं, यहां कोई भी स्वतंत्र नहीं ।
नमन करें गणतंत्र को हम, गण है जिसमें तंत्र नहीं ।।
जो ना पहले राज किया, तो तुम इसके हकदार नहीं ।
पुश्तैनी काम हमारा है, यह आम लोगों की सरकार नहीं ।
प्रजा गुलाम हमारी है, कुछ कहने-करने को स्वतंत्र नहीं ।
नमन करें गणतन्त्र को हम, गण हैं जिसमें तंत्र नहीं ।।
भेज बुलावा लोगों को, सड़कों पर लाते हैं वही ।
गोली दागी मानुष मारे, पत्थर बरसा दिए कहीं ।
तुच्छ मानसिकता वालों के, क्या अब भी हम परतंत्र नहीं ।
नमन करें गणतंत्र को हम, गण है जिसमें तंत्र नहीं ।।
धन जनता का लूट बने राजा, प्रजा का रक्षक कोई नहीं ।
कब तक लूट मचेगी ऐसे, प्रजा, प्रजा है दौलत का संयंत्र नहीं ।
बंधन काटे मुक्त करे, नजर न आता ऐसा मंत्र कहीं ।
नमन करें गणतंत्र को हम, गण हैं जिसमें तंत्र नहीं ।।
मौन खड़े हैं वजीर यहां, महारानी चलती चाल नहीं ।
गणतंत्र प्रजा का रक्षक है, राजाओं की ढाल नहीं ।
नींद खुले युवा राजकुमारों की, ढूंढों ऐसा यंत्र कहीं ।
नमन करें गणतंत्र को हम, गण है जिसमें तंत्र नहीं ।।