मैंने दीप जलाया ही नहीं तो मैं बुझाऊँ क्या,
उसके बारे मे सोचा ही नहीं तो उसको बताऊँ क्या ।
प्यार, मोहब्बत और आशिक़ी सब ज़िंदादिली हैं
जब दिल ही जिंदा नहीं तो फिर किसी से लगाऊँ क्या ।1।
कहते-कहते थक जाता हूँ शब्दों की प्यास बुझाऊँ कैसे
मेरे अंदर वो रहती है ये उसको मैं बताऊँ कैसे ।
चीरकर सीना मेरा इक दर्द निकलता है बाहर
दुनिया से इस जख्म को अब छुपाऊँ कैसे ।2।
रोज मरहम लिए आते हैं बहुत से लोग मेरे अपने
रोज दिखा जाते हैं मुझे जिंदा रहने के सपने ।
अक्सर कह जाते हैं संभल कर रहना दुनिया में
बातों बातों में कैद किए जाते हैं मुझे घर में अपने ।3।
पत्थर सा हुआ जाता हूँ उसके ज़ख्म सह सहकर
आंखो के कोनो से वो बाहर आती है बह बहकर ।
मेरे दिल की आह से खुदा बचाए उसको
अब हर घड़ी यही दुआ करता हूँ रह रहकर ।4।