अमृत की बून्दे बरसी हैं
बनकर अंबर का प्यार धरा पर
जैसे पागल प्रेमी ने
जड़ दिये हों चुंबन प्रियतमा पर [1]
अब निखरेगा यौवन धरा का
श्रृंगार करेगी धरती पेड़ों से
फूलों की डाली गूंथेंगी गजरा
गलहार बनेंगे बेल लताओं से [2]
सौंधी–सौंधी खुशबू मिट्टी की
महकाएगी धरती का तन मन
अंबर धरा की स्नेह लीला की
गवाही बनेंगे वन उपवन [3]
कोयल की कूहू कूहू में
धरती का प्यार बरसता है
सुनने को प्यार भरी ये बोली
अंबर कितने मास तरसता है [4]
छम छम करती बूँदें भी
प्यार का राग सुनाती हैं
पाकर अंबर का प्यार धरा
धन्य धन्य हो जाती है [5]
मीलों दूर खड़े दो प्रेमी
देख-देख मुस्काते हैं
मिलने को गले इक दूजे को देखो
अपनी बाहें फैलाते हैं[6]
शाखायें बन बाहें धरती की
अंबर की और चली जाती
बारिश की छोटी–छोटी बूँदें
अंबर की बाहें बन जाती [7]
हवा गा रही गीत सुहाने
बनकर मतवाला जोगी
अंबर-धरा के मिलन की परिणिति
अगणित लोगों के दुख हर लेगी [8]
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