Thursday, July 29, 2010

पतझड़ के बाद...

उसने कहा था एक बार
पतझड़ के बाद जब
लौटेगा फिर से बसन्त
कोपलें फूटेंगी वृक्षों पर
चारो तरफ होगी हरियाली
भीनी-भीनी खुशबू
महकाएगी तन-मन को
तब तुम महसूस करोगे
कितना जरूरी है पतझड़।।
चिड़िया मोर सब नाचेंगे
उजड़े बाग सँवर जाएंगे
गैंदा, गुलाब, जूही और चमेली
मिलकर खुशियां बांटेंगे
खिला-खिला होगा हर चेहरा
गमों के निशां मिट जाएंगे
जो दूर गए थे पंछी
अपने घर को वापस आएंगे
घर वापस आने के सुख में
तुम महसूस करोगे
कितना जरूरी है पतझड़।।
दु:ख तो आना-जाना है
फिर मन उदास क्यूं है तेरा
हर घनी काली रात का
अंत करने आता रोज सवेरा
हताश ना हो निराश ना हो
उम्मीदों के दीप जलाए जा
इतनी आसानी से मिल जाए सब
तो क्या जीवन का मोल रहा
दु:ख घटेंगे दर्द मिटेंगे
फिर लौट आएगा सुख
तब तुम महसूस करोगे
कितना जरूरी है पतझड़।।

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