लो देखो आज सावन की
फिर से झड़ी लगी है
आँखें आज मेरी
न जाने क्यूं बहने लगी हैं।
तू पास था मेरे तो
झीलें बहा करती थी
पर अब तो इनमें
खामोशी बसा करती है
पलकों पर जो आते थे मोती
पगली दुनिया अब उनको
आँसू कहा करती है।
ना जाने कितने दिन तक
रिमझिम-रिमझिम बरसेंगी
आ देख ज़रा हालत इनकी
पिर जीवन भर तू तरसेगी
मेरे गालों पर निशां बाकी हैं
मेरी तन्हा रातों के
तू देख ज़रा आकर
अब भी गंगा-जमुना बहती है
तू चला गया है दूर कहीं
छोड़ के दुनिया मेरी
इन सागर जैसी आँखों में
आज भी सूरत बसी है तेरी।
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