Sunday, July 17, 2016

युवा एवं उत्साही पत्रकारों द्वारा निकाला गया समाचार पत्र मीडिया स्केन पढा जिसे भाई आशीष कुमार अंशु ने उपलब्ध करवाया ।
दशकों से की जा रही गलत एवं एकतरफा रिपोर्टिंग पर केन्द्रित यह अंक पढकर ज्ञात हुआ कि समाज में जो वास्तव मे घटित हो रहा है वह तो समाज के सामने आ ही नही रहा मतलब अब खबरें भी मुखोटा पहन ने लगी हैं। इस तरह की एक तरफा पत्रकारिता समाज को बांटने का ही काम कर रही है जो कि तथाकथित पत्रकार का उद्देश्य भी रहता है क्योंकि वो किसी और के हाथों की कठपुतली होता है ।
सूचना क्रांति के इस युग मे भी समाज के सामने सच्ची खबरें नही आ रही यह सूचना संसाधनो का दुरूपयोग ही कहलायेगा ।
लोग स्वार्थवश इस प्रकार की रिपोर्टिंग कर रहे हैं कि बेगुनाह होते हुए भी लोगों को शारीरिक, मानसिक प्रताड़नांए भुगतनी पड़ रही हैं उदाहरण के तौर पर गुजरात दंगो के समय फोटो पत्रकार की प्रसिद्धि पाने की लालसा के कारण एक सीधे साधे इंसान का जीवन ही बरबाद कर दिया ।
पत्रकारों का एक विशेष तबका ( जो कि वास्तव में पत्रकार कहलाने योग्य नहीं है ) खबरों का इस तरह से पोस्टमार्टम करता है कि खबर की तासीर ही बदल जाती है । और फिर शुरू होता है खबरें घुमाने का खेल क्योंकि ढोंगी पत्रकार यह अच्छी तरह समझते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक परिस्थितियां एेसी हैं कि उनके द्वारा बनाई गई झूठी खबर की सच्चाई सूदूर इलाकों मे पंहुचते - पंहुचते इतना वक्त ले लेगी कि तब तक उस खबर मे निहित स्वार्थ पूर्ण हो चुका होगा । मीडिया स्केन मे आदिवासी इलाकों का सच जानने के बाद बस यही एक दुअा है ईश्वर से कि आप सभी पत्रकारों का हौसला बनाए रखे ताकि समाज के हर तबके तक समाज मे फैलाई जा रही इस वैमनस्यता की सच्चाई पंहुच सके ।
समाज के लोगों से भी यही अपेक्षा की जाती है कि सच्चाई के साथ खड़े हों और पत्रकारिता को धर्म की तरह मानने वाले लोगों का पूर्ण सहयोग करें ।
साथ ही साथ यह कामना भी कि जो ढोंगी पत्रकार समाज मे वैमनस्यता फैलाकर अपनी तिजोरी भर रहे हैं तथा राजनैतिक आकाओं के मंसूबे पूर्ण कर रहे हैं उनका प्रतिकार करें तथा अपने आस पास के परिवेश से बहिष्कृत करें एवं उनके लिखे हुए पर आंख बंद कर विश्वास ना करें, जिससे किसी बेगुनाह को शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना ना झेलनी पड़े ।
लगे हाथ ही एक बात और जिस प्रकार अपने फायदे के लिए खबरें दबा दी जाती हैं उस से एक ना एक दिन सामाजिक सोहार्द्र बिगड़ कर ही रहता है।
मीडिया स्केन के द्वारा ही यह जानकारी मिली कि मिजोरम के अल्प संख्यक चकमा बौद्धों पर हो रहे अत्याचार की खबरें बाहर समाज तक आ ही नहीं रही हैं क्योंकि राष्ट्रीय मीडिया इस पर चुप्पी साधे बैठा है यह बौद्ध समाज पर हो रहे अत्याचारों मे शामिल होने जैसा ही अपराध है ।
आखिर खबरें दबाकर मीडिया किसका भला कर रहा है यह बात जानने योग्य है ।
अल्प संख्यकों एवं दलितो के उत्थान का दम भरने वाले सामाजिक संगठन एवं राजनीतिक दलों की चुप्पी को स्वार्थपरता ही कहा जाएगा ।
यह चुप्पी इन संगठनो एवं राजनीतिक दलों के गठबंधन को जल्द ही भारी पड़ने वाली है क्येकि देखने मे यह आ रहा है कि कुछ युवा पत्रकार इन सबके दुष्कृत्यों को उजागर करने के लिए कमर कस चुके हैं ।
उम्मीद है मीडिया स्केन की निस्वार्थ एवं नैतिक पत्रकारिता की मुहिम जल्द ही पत्रकारिता के क्षेत्र मे बडे़ बदलाव की साक्षी बनेगी और यह स्वाभाविक है कि समाज भी इस से लाभान्वित होगा ।

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